अनाथ बच्चों कि माँ सिन्धुताई सपकाल – Sindhutai Sapkal
By
Gyani Pandit
-
May 17, 2016
सिन्धुताई सपकाल / Sindhutai Sapkal अनाथ बच्चों के लिए समाजकार्य करनेवाली मराठी सामाजिक कार्यकर्ता है. अपने जीवन मे कठिन समस्याये होने के बावजूद उन्होंने अनाथ बच्चों को सम्भालने का कार्य किया है.
सिन्धुताई सपकाल कि संघर्षमय कहानी – Sindhutai Sapkal

जन्म और शिक्षा:-
सिन्धुताई का जन्म 14 नवम्बर 1947 को महाराष्ट्र के वर्धा जिल्हे मे ‘पिंपरी मेघे’ गाँव मे हुआ था. उनके पिताजी का नाम ‘अभिमान साठे’ था, जो कि एक चर्वाह (जानवरों को चरानेवाला) थे. बेटी होने की वजह से सिंधुताई को घर में सभी लोग नापसंद करते (क्योंकि वे एक बेटी थी; बेटा नही) थे, इसिलिए उन्हे घर मे ‘चिंधी’ कहकर(कपड़े का फटा टुकड़ा) बुलाते थे. परन्तु उनके पिताजी सिन्धु को पढ़ाना चाहते थे, इसिलिए वे सिन्धु कि माँ के खिलाफ जाकर सिन्धु को पाठशाला भेजते थे. माँ का विरोध और घर कि आर्थिक परस्थितीयों की वजह से सिन्धु की शिक्षा मे बाधाये आती रही. जब वे चौथी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण हुई तब आर्थिक परस्थिती, घर कि जिम्मेदारीयाँ और बालविवाह इन कारणों कि वजह से उन्हे पाठशाला छोड़नी पड़ी.
विवाह और शुरुआत:-
जब सिन्धुताई 10 साल की थी तब उनकी शादी 30 वर्षीय ‘श्रीहरी सपकाळ’ से हुई. जब उनकी उम्र 20 साल की थी तब वह 3 बच्चों कि माँ बनी थी. गाँववालों को उनकी मजदुरी के पैसे ना देनेवाले गाँव के मुखिया कि शिकायत सिन्धुताई ने जिल्हा अधिकारी से की थी. अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए मुखियाने श्रीहरी (सिन्धुताई के पती) को सिन्धुताई को घर से बाहर निकालने के लिए प्रवृत्त किया जब वे 9 महिने से गर्भवती थी. उसी रात उन्होने तबेले मे (गाय-भैंसों के रहने की जगह) मे एक बेटी को जन्म दिया. जब वे अपनी माँ के घर गयी तब उनकी माँ ने उन्हे घर मे रहने से इंकार कर दिया (उनके पिताजी का देहांत हुआ था वरना वे अवश्य अपनी बेटी को सहारा देते). सिन्धुताई अपनी बेटी के साथ रेल्वे स्टेशन पे रहने लगी थी. पेट भरने के लिये भीक माँगती और रात को खुद को और बेटी को सुरक्षित रखने के लिये शमशान मे रहती. उनके इस संघर्षमयी काल मे उन्होंने यह अनुभव किया कि देश मे कितने सारे अनाथ बच्चे है जिनको एक माँ की जरुरत है. तब से उन्होने निर्णय लिया कि जो भी अनाथ उनके पास आएगा वह उनकी माँ बनेंगी. उन्होने अपनी खुद कि बेटी को ‘श्री दगडुशेठ हलवाई, पुणे, महाराष्ट्र’ ट्र्स्ट मे गोद दे दिया ताकि वे सारे अनाथ बच्चों की माँ बन सके.
बस तीन बूँद और पेट का मोटापा चला गया ... सस्ता घरेलू तरीका!१५ मिनट में गोरी त्वचा पाने के लिए घर की जुगाड़खाली पेट दो चम्मच खाने से वज़न घटता है| १० दीनो मे १८ किलो वज़न घटा! क्लिक करेएक हफ्ते में तोंद गायब! बस सोने के पहले लें...घर पर तुरंत वजन कम करें! रोज ढाई किलो वजन कम करें खाली पेट में यह पीकर...सुस्त लोगो के चर्बी घटाने का माध्यम सोते वक़्त हर दिन आप २ किलो चर्बी घटाइए

आगे के काम:-
सिन्धुताई ने अपना पुरा जीवन अनाथ बच्चों के लिये समर्पित किया है. इसिलिए उन्हे “माई” (माँ) कहा जाता है. उन्होने 1050 अनाथ बच्चों को गोद लिया है. उनके परिवार मे आज 207 दामाद और 36 बहूएँ है. 1000 से भी ज्यादा पोते-पोतियाँ है. उनकी खुद की बेटी वकील है और उन्होने गोद लिए बहोत सारे बच्चे आज डाक्टर, अभियंता, वकील है और उनमे से बहोत सारे खुदका अनाथाश्रम भी चलाते है. सिन्धुताई को कुल 273 राष्ट्रीय और आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है जिनमे “अहिल्याबाई होऴकर पुरस्कार” भी शामिल है जो महाराष्ट्र राज्य द्वारा स्रियाँ और बच्चों के लिए काम करनेवाले समाजकर्ताओं को मिलता है. पुरस्कार से मिले इन सारे पैसो का उपयोग वे अनाथाश्रम के लिए करती है. उनके अनाथाश्रम पुणे, वर्धा, सासवड (महाराष्ट्र) मे स्थित है. 2010 साल मे सिन्धुताई के जीवन पर आधारित मराठी फ़िल्म बनायी गयी “मी सिन्धुताई सपकाळ”, जो 54 वे लंडन फ़िल्म महोत्सव के लिए चुनी गयी थी. सिन्धुताई के पती जब 80 साल के हो गये तब वे उनके साथ रहने के लिये आये थे. सिन्धुताई ने अपने पति को एक बेटे के रुप मे स्वीकार किया ये कहते हुए कि अब वो सिर्फ एक माँ है. आज वे बडे गर्व के साथ बताती है कि वो (उनके पति) उनका सबसे बडा बेटा है.
सिन्धुताई कविता भी लिखती है. और उनकी कविताओं मे जीवन का पूरा सार होता है. वे अपनी माँ का आभार व्यक्त करती है क्योकि वे कहति है अगर उनकी माँ ने उनको पति के घर से निकालने के बाद घर मे सहारा दिया होता तो आज वो इतने सारे बच्चों की माँ नही बन पाती.
संस्था:-
सन्मति बाल निकेतन, भेल्हेकर वस्ति, हडपसर पुणे.
ममता बाल सादन, कुम्भरवालन, सस्वाद.
माई आश्रम चिखलदरा, अमरावती.
अभीमान बाल भवन, वर्धा.
गंगाधरबाबा छात्रालय गुहा.
सप्तसिंधु महिला अधर बालसंगोपन आणि शिक्षण संस्था पुणे.
अवार्ड्स:-
2015 – अह्मदिय्य मुस्लिम पीस प्राइज फॉर दी इयर 2014
2014 – बसवा भूषण पुरस्कार 2014 अवार्ड, बसवा सेवा संग पुणे की और से.
2013 – मदर टेरेसा अवार्ड फॉर सोशल जस्टिस
2013 – दी नेशनल अवार्ड फॉर आयनिक मदर.
2012 – रियल हेरासेस अवार्ड, CNN – IBN एंड रिलायंस फाउंडेशन की और से.
2010 – अहिल्याबाई होलकर, अवार्ड, महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिया जाता है.
2008 – वुमन ऑफ़ दी इयर अवार्ड, लोकसत्ता द्वारा दिया जाता है.
1996 – दत्तक माता पुरस्कार.
1992 – लीडिंग सोशल कंट्रीब्यूटर अवार्ड.
सह्याद्री हिर्कानी अवार्ड
शिवलीला महिला गौरव अवार्ड.
महानता:-
सिन्धुताई पर आधारित 2010 में एक मराठी फिल्म भी आई थी, ‘मी सिन्धुताई सपकाळ’ जो एक सत्य कहानी पे आधारित थी. और इस फिल्म को 54 लन्दन फिल्म फेस्टिवल के लिए भी चुना गया था.
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Gyani Pandit
-
May 17, 2016
सिन्धुताई सपकाल / Sindhutai Sapkal अनाथ बच्चों के लिए समाजकार्य करनेवाली मराठी सामाजिक कार्यकर्ता है. अपने जीवन मे कठिन समस्याये होने के बावजूद उन्होंने अनाथ बच्चों को सम्भालने का कार्य किया है.
सिन्धुताई सपकाल कि संघर्षमय कहानी – Sindhutai Sapkal

जन्म और शिक्षा:-
सिन्धुताई का जन्म 14 नवम्बर 1947 को महाराष्ट्र के वर्धा जिल्हे मे ‘पिंपरी मेघे’ गाँव मे हुआ था. उनके पिताजी का नाम ‘अभिमान साठे’ था, जो कि एक चर्वाह (जानवरों को चरानेवाला) थे. बेटी होने की वजह से सिंधुताई को घर में सभी लोग नापसंद करते (क्योंकि वे एक बेटी थी; बेटा नही) थे, इसिलिए उन्हे घर मे ‘चिंधी’ कहकर(कपड़े का फटा टुकड़ा) बुलाते थे. परन्तु उनके पिताजी सिन्धु को पढ़ाना चाहते थे, इसिलिए वे सिन्धु कि माँ के खिलाफ जाकर सिन्धु को पाठशाला भेजते थे. माँ का विरोध और घर कि आर्थिक परस्थितीयों की वजह से सिन्धु की शिक्षा मे बाधाये आती रही. जब वे चौथी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण हुई तब आर्थिक परस्थिती, घर कि जिम्मेदारीयाँ और बालविवाह इन कारणों कि वजह से उन्हे पाठशाला छोड़नी पड़ी.
विवाह और शुरुआत:-
जब सिन्धुताई 10 साल की थी तब उनकी शादी 30 वर्षीय ‘श्रीहरी सपकाळ’ से हुई. जब उनकी उम्र 20 साल की थी तब वह 3 बच्चों कि माँ बनी थी. गाँववालों को उनकी मजदुरी के पैसे ना देनेवाले गाँव के मुखिया कि शिकायत सिन्धुताई ने जिल्हा अधिकारी से की थी. अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए मुखियाने श्रीहरी (सिन्धुताई के पती) को सिन्धुताई को घर से बाहर निकालने के लिए प्रवृत्त किया जब वे 9 महिने से गर्भवती थी. उसी रात उन्होने तबेले मे (गाय-भैंसों के रहने की जगह) मे एक बेटी को जन्म दिया. जब वे अपनी माँ के घर गयी तब उनकी माँ ने उन्हे घर मे रहने से इंकार कर दिया (उनके पिताजी का देहांत हुआ था वरना वे अवश्य अपनी बेटी को सहारा देते). सिन्धुताई अपनी बेटी के साथ रेल्वे स्टेशन पे रहने लगी थी. पेट भरने के लिये भीक माँगती और रात को खुद को और बेटी को सुरक्षित रखने के लिये शमशान मे रहती. उनके इस संघर्षमयी काल मे उन्होंने यह अनुभव किया कि देश मे कितने सारे अनाथ बच्चे है जिनको एक माँ की जरुरत है. तब से उन्होने निर्णय लिया कि जो भी अनाथ उनके पास आएगा वह उनकी माँ बनेंगी. उन्होने अपनी खुद कि बेटी को ‘श्री दगडुशेठ हलवाई, पुणे, महाराष्ट्र’ ट्र्स्ट मे गोद दे दिया ताकि वे सारे अनाथ बच्चों की माँ बन सके.
बस तीन बूँद और पेट का मोटापा चला गया ... सस्ता घरेलू तरीका!१५ मिनट में गोरी त्वचा पाने के लिए घर की जुगाड़खाली पेट दो चम्मच खाने से वज़न घटता है| १० दीनो मे १८ किलो वज़न घटा! क्लिक करेएक हफ्ते में तोंद गायब! बस सोने के पहले लें...घर पर तुरंत वजन कम करें! रोज ढाई किलो वजन कम करें खाली पेट में यह पीकर...सुस्त लोगो के चर्बी घटाने का माध्यम सोते वक़्त हर दिन आप २ किलो चर्बी घटाइए

आगे के काम:-
सिन्धुताई ने अपना पुरा जीवन अनाथ बच्चों के लिये समर्पित किया है. इसिलिए उन्हे “माई” (माँ) कहा जाता है. उन्होने 1050 अनाथ बच्चों को गोद लिया है. उनके परिवार मे आज 207 दामाद और 36 बहूएँ है. 1000 से भी ज्यादा पोते-पोतियाँ है. उनकी खुद की बेटी वकील है और उन्होने गोद लिए बहोत सारे बच्चे आज डाक्टर, अभियंता, वकील है और उनमे से बहोत सारे खुदका अनाथाश्रम भी चलाते है. सिन्धुताई को कुल 273 राष्ट्रीय और आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है जिनमे “अहिल्याबाई होऴकर पुरस्कार” भी शामिल है जो महाराष्ट्र राज्य द्वारा स्रियाँ और बच्चों के लिए काम करनेवाले समाजकर्ताओं को मिलता है. पुरस्कार से मिले इन सारे पैसो का उपयोग वे अनाथाश्रम के लिए करती है. उनके अनाथाश्रम पुणे, वर्धा, सासवड (महाराष्ट्र) मे स्थित है. 2010 साल मे सिन्धुताई के जीवन पर आधारित मराठी फ़िल्म बनायी गयी “मी सिन्धुताई सपकाळ”, जो 54 वे लंडन फ़िल्म महोत्सव के लिए चुनी गयी थी. सिन्धुताई के पती जब 80 साल के हो गये तब वे उनके साथ रहने के लिये आये थे. सिन्धुताई ने अपने पति को एक बेटे के रुप मे स्वीकार किया ये कहते हुए कि अब वो सिर्फ एक माँ है. आज वे बडे गर्व के साथ बताती है कि वो (उनके पति) उनका सबसे बडा बेटा है.
सिन्धुताई कविता भी लिखती है. और उनकी कविताओं मे जीवन का पूरा सार होता है. वे अपनी माँ का आभार व्यक्त करती है क्योकि वे कहति है अगर उनकी माँ ने उनको पति के घर से निकालने के बाद घर मे सहारा दिया होता तो आज वो इतने सारे बच्चों की माँ नही बन पाती.
संस्था:-
सन्मति बाल निकेतन, भेल्हेकर वस्ति, हडपसर पुणे.
ममता बाल सादन, कुम्भरवालन, सस्वाद.
माई आश्रम चिखलदरा, अमरावती.
अभीमान बाल भवन, वर्धा.
गंगाधरबाबा छात्रालय गुहा.
सप्तसिंधु महिला अधर बालसंगोपन आणि शिक्षण संस्था पुणे.
अवार्ड्स:-
2015 – अह्मदिय्य मुस्लिम पीस प्राइज फॉर दी इयर 2014
2014 – बसवा भूषण पुरस्कार 2014 अवार्ड, बसवा सेवा संग पुणे की और से.
2013 – मदर टेरेसा अवार्ड फॉर सोशल जस्टिस
2013 – दी नेशनल अवार्ड फॉर आयनिक मदर.
2012 – रियल हेरासेस अवार्ड, CNN – IBN एंड रिलायंस फाउंडेशन की और से.
2010 – अहिल्याबाई होलकर, अवार्ड, महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिया जाता है.
2008 – वुमन ऑफ़ दी इयर अवार्ड, लोकसत्ता द्वारा दिया जाता है.
1996 – दत्तक माता पुरस्कार.
1992 – लीडिंग सोशल कंट्रीब्यूटर अवार्ड.
सह्याद्री हिर्कानी अवार्ड
शिवलीला महिला गौरव अवार्ड.
महानता:-
सिन्धुताई पर आधारित 2010 में एक मराठी फिल्म भी आई थी, ‘मी सिन्धुताई सपकाळ’ जो एक सत्य कहानी पे आधारित थी. और इस फिल्म को 54 लन्दन फिल्म फेस्टिवल के लिए भी चुना गया था.
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