गौतम बुद्ध के पांच शिशय थे, जब वे तपश्चर्या कर रहे थे। फिर बुद्ध को लगा कि इस तपश्चर्या में कुछ सार नहीं है, व्यर्थ मैं अपने शरीर को सुखा रहा हूं; यह तो निपट दुखवाद है; यह तो आत्महिंसा है। तो उन्होंने तपश्चर्या छोड़ दी। वे जो पांच शिशय थे वे तो परंपरागत रूप से इसीलिए उनके शिशय थे कि बुद्ध तपश्चर्या में बड़े कुशल थे, अपने को सताने में लाजवाब थे। ऐसे-ऐसे ढंग से अपने को सताते थे, ऐसी-ऐसी नई-नई ईजादें करते थे अपने को सताने की, इसीलिए वे पांच उनसे प्रभावित थे। उन्होंने देखा: यह तो भ्रशट हो गया, गौतम भ्रशट हो गया। अब इसने तपश्चर्या छोड़ दी। तो वे छोड़ कर चले गए।
और तब बुद्ध को परमज्ञान हुआ। जब परमज्ञान बुद्ध को हुआ तो उन्होंने कहा कि पहले मैं उन पांच को खोजूं जो मुझे छोड़ कर चले गए थे। कुछ भी हो, वे मेरे साथ वर्षों रहे। वे मुझे छोड़ कर चले गए हैं, मैंने उन्हें नहीं छोड़ दिया है। उनकी नासमझी के लिए इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं है। तो वे उनकी तलाश में आए, इसीलिए सारनाथ तक आए, क्योंकि जैसे-जैसे उनकी खोज की, पता चला वे और आगे, और आगे, पता चला वे सारनाथ में रुके हुए हैं, तो वे सारनाथ आए। सुबह का वक्त है। ऐसी ही सुबह रही होगी। वे पांचों बैठे हैं एक वृक्ष के नीचे और उन्होंने देखा बुद्ध को आते हुए। उन पांचों ने कहा: यह भ्रशट गौतम आ रहा है। हम इसको उठ कर नमस्कार न करें। यह भ्रशट हो चुका है, इसको क्यों नमस्कार करना? हम इसकी तरफ पीठ ही रखें। आए और खुद ही बैठ जाए तो बैठ जाए। हम यह भी नहीं कहेंगे कि आइए, पधारिए, विराजिए। हम क्यों कहें? इससे तो हम ही बेहतर हैं, कम से कम अपने मार्ग पर तो डटे हुए हैं। यह तो मार्ग से च्युत हो गया।
उन्होंने पांचों ने तय कर लिया। मगर जैसे-जैसे बुद्ध करीब आए, वैसे-वैसे मुश्किल होने लगी। एक उठा और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। दूसरा उठा और वह भी गिरा। फिर तो पांचों उठे और बुद्ध के चरणों पर गिरे। बुद्ध ने कहा कि मेरे मित्रो, इतनी जल्दी अपना संकल्प नहीं छोड़ देना चाहिए। क्या तुमने तय नहीं किया था...क्योंकि तुम्हारे ढंग देख कर मुझे लग रहा था कि तुमने तय किया है...कि सम्मान नहीं दोगे। तुमने मेरी तरफ पीठ कर ली। फिर तुम मेरे चरणों में क्यों गिरे?
उन्होंने कहा: यह तो हमें भी पता नहीं। मगर तुम्हारे साथ एक हवा आई, तुम्हारे साथ गंध का एक प्रवाह आया! तुम क्या आए, एक ऊर्जा आई, एक वातावरण आया। तुम क्या आए जैसे वसंत आया और फूल अपने आप खिलने लगें। हम करें भी तो क्या करें?
इसको मैं श्रद्धा कहता हूं: फूल अपने आप खिलने लगे।
आदर, आनंद मैत्रेय, औपचारिक होता है--दो कौड़ी का, उसका कोई भी मूल्य नहीं। मूल्य है तो श्रद्धा का। भाषाकोश में तो दोनों का एक ही अर्थ है, लेकिन जीवन के कोष में दोनों बड़े विपरीत हैं। श्रद्धा में प्राण होते हैं; आदर लाश है। आदर होता है परंपरागत; श्रद्धा होती है व्यक्तिगत। आदर होता है सामूहिक; श्रद्धा होती है निजी, आत्मगत। श्रद्धा अपना निर्णय है; आदर दूसरों का निर्णय है। और जो दूसरों के निर्णय से चलता है, वह भी कोई आदमी है? भेड़ है! आदर में शर्त होती है, फिर शर्त चाहे कोई भी हो--आयु की शर्त हो, कि कोई उम्र में बड़ा है, तो उसको आदर देना चाहिए। अब उम्र में बड़े होने से क्या आदर का संबंध है? कोई संबंध नहीं है। कितने तो बूढ़े हैं दुनिया में, जो बचकानी प्रवृत्तियों से भरे हुए हैं। कोई बूढ़े होने से ही थोड़े प्रौढ़ होता है। काश प्रौढ़ता इतनी सस्ती बात होती, कि बूढ़े हो गए और प्रौढ़ हो गए! अधिकतर लोग तो बाल धूप में ही सफेद करते हैं। जीवन का अनुभव और बात है। उम्र का बढ़ते जाना और बात है। उम्र तो जानवरों की भी बढ़ेगी। उम्र तो बढ़ती चली जाएगी। वह तो घड़ी और कैलेंडर की बात है; आत्मा की नहीं। ऐसे भी पड़े रहे तो भी उम्र बढ़ती ही रहेगी; कुछ भी न किया तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। सब तरह की मूढ़ताएं करते रहे तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। उम्र का कोई संबंध बोध से नहीं है।
रहिमन धागा प्रेम का # 10 ओशो
और तब बुद्ध को परमज्ञान हुआ। जब परमज्ञान बुद्ध को हुआ तो उन्होंने कहा कि पहले मैं उन पांच को खोजूं जो मुझे छोड़ कर चले गए थे। कुछ भी हो, वे मेरे साथ वर्षों रहे। वे मुझे छोड़ कर चले गए हैं, मैंने उन्हें नहीं छोड़ दिया है। उनकी नासमझी के लिए इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं है। तो वे उनकी तलाश में आए, इसीलिए सारनाथ तक आए, क्योंकि जैसे-जैसे उनकी खोज की, पता चला वे और आगे, और आगे, पता चला वे सारनाथ में रुके हुए हैं, तो वे सारनाथ आए। सुबह का वक्त है। ऐसी ही सुबह रही होगी। वे पांचों बैठे हैं एक वृक्ष के नीचे और उन्होंने देखा बुद्ध को आते हुए। उन पांचों ने कहा: यह भ्रशट गौतम आ रहा है। हम इसको उठ कर नमस्कार न करें। यह भ्रशट हो चुका है, इसको क्यों नमस्कार करना? हम इसकी तरफ पीठ ही रखें। आए और खुद ही बैठ जाए तो बैठ जाए। हम यह भी नहीं कहेंगे कि आइए, पधारिए, विराजिए। हम क्यों कहें? इससे तो हम ही बेहतर हैं, कम से कम अपने मार्ग पर तो डटे हुए हैं। यह तो मार्ग से च्युत हो गया।
उन्होंने पांचों ने तय कर लिया। मगर जैसे-जैसे बुद्ध करीब आए, वैसे-वैसे मुश्किल होने लगी। एक उठा और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। दूसरा उठा और वह भी गिरा। फिर तो पांचों उठे और बुद्ध के चरणों पर गिरे। बुद्ध ने कहा कि मेरे मित्रो, इतनी जल्दी अपना संकल्प नहीं छोड़ देना चाहिए। क्या तुमने तय नहीं किया था...क्योंकि तुम्हारे ढंग देख कर मुझे लग रहा था कि तुमने तय किया है...कि सम्मान नहीं दोगे। तुमने मेरी तरफ पीठ कर ली। फिर तुम मेरे चरणों में क्यों गिरे?
उन्होंने कहा: यह तो हमें भी पता नहीं। मगर तुम्हारे साथ एक हवा आई, तुम्हारे साथ गंध का एक प्रवाह आया! तुम क्या आए, एक ऊर्जा आई, एक वातावरण आया। तुम क्या आए जैसे वसंत आया और फूल अपने आप खिलने लगें। हम करें भी तो क्या करें?
इसको मैं श्रद्धा कहता हूं: फूल अपने आप खिलने लगे।
आदर, आनंद मैत्रेय, औपचारिक होता है--दो कौड़ी का, उसका कोई भी मूल्य नहीं। मूल्य है तो श्रद्धा का। भाषाकोश में तो दोनों का एक ही अर्थ है, लेकिन जीवन के कोष में दोनों बड़े विपरीत हैं। श्रद्धा में प्राण होते हैं; आदर लाश है। आदर होता है परंपरागत; श्रद्धा होती है व्यक्तिगत। आदर होता है सामूहिक; श्रद्धा होती है निजी, आत्मगत। श्रद्धा अपना निर्णय है; आदर दूसरों का निर्णय है। और जो दूसरों के निर्णय से चलता है, वह भी कोई आदमी है? भेड़ है! आदर में शर्त होती है, फिर शर्त चाहे कोई भी हो--आयु की शर्त हो, कि कोई उम्र में बड़ा है, तो उसको आदर देना चाहिए। अब उम्र में बड़े होने से क्या आदर का संबंध है? कोई संबंध नहीं है। कितने तो बूढ़े हैं दुनिया में, जो बचकानी प्रवृत्तियों से भरे हुए हैं। कोई बूढ़े होने से ही थोड़े प्रौढ़ होता है। काश प्रौढ़ता इतनी सस्ती बात होती, कि बूढ़े हो गए और प्रौढ़ हो गए! अधिकतर लोग तो बाल धूप में ही सफेद करते हैं। जीवन का अनुभव और बात है। उम्र का बढ़ते जाना और बात है। उम्र तो जानवरों की भी बढ़ेगी। उम्र तो बढ़ती चली जाएगी। वह तो घड़ी और कैलेंडर की बात है; आत्मा की नहीं। ऐसे भी पड़े रहे तो भी उम्र बढ़ती ही रहेगी; कुछ भी न किया तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। सब तरह की मूढ़ताएं करते रहे तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। उम्र का कोई संबंध बोध से नहीं है।
रहिमन धागा प्रेम का # 10 ओशो
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